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    Home»राज्य»मध्यप्रदेश»विश्व रत्न थे मो. रफ़ी साहब, न दूसरे हुए न होंगे: शाहिद रफ़ी, स्टेट प्रेस क्लब में रफ़ी साहब की यादों के साथ रूबरू हुए शाहिद रफ़ी
    मध्यप्रदेश

    विश्व रत्न थे मो. रफ़ी साहब, न दूसरे हुए न होंगे: शाहिद रफ़ी, स्टेट प्रेस क्लब में रफ़ी साहब की यादों के साथ रूबरू हुए शाहिद रफ़ी

    News DeskBy News DeskDecember 30, 2024No Comments5 Mins Read
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    विश्व रत्न थे मो. रफ़ी साहब, न दूसरे हुए न होंगे: शाहिद रफ़ी, स्टेट प्रेस क्लब में रफ़ी साहब की यादों के साथ रूबरू हुए शाहिद रफ़ी
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    इंदौर। "रफ़ी साहब को भारत रत्न मिले यह दुनिया भर के संगीत प्रेमियों के साथ हम परिवारजन भी चाहते हैं। लेकिन फिर यह ख़याल भी आता है कि रफ़ी साहब तो दुनिया भर के संगीत प्रेमियों के दिलों में बसे हुए हैं। वास्तव में वे विश्व रत्न हैं।"

    यह बात अमर गायक श्री मोहम्मद रफ़ी साहब के सबसे छोटे सुपुत्र श्री शाहिद रफ़ी ने स्टेट प्रेस क्लब, मप्र के संवाद कार्यक्रम में संस्कृतिकर्मी एवं पत्रकार आलोक बाजपेयी के प्रश्नों के उत्तर में कहीं। उन्होंने रफ़ी साहब के जन्म शताब्दी वर्ष में दुनिया में किए जा रहे आयोजनों के संदर्भ में कहा कि 24 दिसम्बर में पूरे मुम्बई में छोटा – बड़ा कोई भी सभागार खाली नहीं था। रफ़ी साहब की लोकप्रियता हर बीतते वर्ष के साथ बढ़ती जा रही है जो कि ऊपर वाले का करम है। रफ़ी साहब बहुत ही विनम्र, ख़ुदा से डरने वाले, साफ दिल और मददगार इंसान थे। वो अपनी आवाज़, उसकी खूबियों और सारी उपलब्धियों को ईश्वर की देन मानते थे और हमें भी सदा यही सीख दी कि सदा निगाह ज़मीन पर रखना, आसमान निगाह रखने से ठोकर लग सकती है।  उन्होंने कभी यह एहसास नहीं होने दिया कि वे इतने बड़े सितारा गायक हैं और हमने सदैव सिर्फ बहुत कम और धीमी आवाज़ में बोलने वाले बहुत प्यार करने वाले, परिवार के प्रति समर्पित पिता के रूप में ही देखा। 

    मो. रफ़ी साहब की दयानतदारी के विषय में श्री शाहिद रफ़ी ने कहा कि यदि उन्होंने दूसरों की तरह पैसे बटोरे होते तो आधा बांद्रा हमारा होता। उन्होंने एक किस्सा सुनाते हुए कहा कि रफ़ी साहब के इंतकाल के बाद एक फकीर कश्मीर से घर आया और रफ़ी साहब से मिलने की ज़िद करने लगा। जब उसे बताया गया कि रफ़ी साहब को गुजरे छह माह बीत गए तब उस फकीर ने कहा कि तभी मैं सोचूं कि हर महीने पैसे आना क्यों बंद हो गए। रफ़ी साहब द्वारा गाने की रिकॉर्डिंग की तैयारी बताते हुए उन्होंने कहा कि वे सबसे पहले गीत लिखते, हमारे मामू के साथ उसकी मात्राओं आदि को दुरुस्त कर अपनी मार्किंग करते और फिर अपनी संतुष्टि तक रिहर्सल करते। यह रिहर्सल कई दिन और हफ़्ते भी चल सकती थी। ' ओ दुनिया के रखवाले ' गीत की रिहर्सल की उन्होंने एक महीने रिहर्सल की थी। फिल्म निर्माता बी आर चोपड़ा कि फिल्मों में कुछ वर्ष गाने न गाने का राज़ बताते हुए उन्होंने किस्सा सुनाया कि श्री चोपड़ा ने मांग की थी कि रफ़ी साहब सिर्फ उनके बैनर के लिए गाएं, जिसे रफ़ी साहब ने विनम्रता से ठुकरा दिया था। इसके बाद चोपड़ा जी ने रफ़ी साहब से गीत नहीं गवाया लेकिन ' वक़्त' फिल्म के लिए अंततः उन्हें गाना गवाना ही पड़ा क्योंकि संगीतकार का कहना था कि ये गीत सिर्फ रफ़ी साहब ही गा सकते हैं और रफ़ी साहब ने बिना किसी शिकायत के गाना रिकॉर्ड किया था। 'बाबुल की दुनिया लेती जा ' गीत का किस्सा सुनाते हुए उन्होंने बताया कि इस गीत के रिकॉर्डिंग के मात्र सात दिन पहले सबसे बड़ी और लाडली बेटी की शादी थी। अब्बा ने उस समय अपनी भावनाओं को जज़्ब रखा। इस गीत की रिहर्सल में भी वे संयत रहे लेकिन गाने की रिकॉर्डिंग के दौरान आखिरी अंतरे में बेटी की याद में उनकी रुलाई फूट पड़ी और गीत में उनकी हिचकी असली ही थी। यह गीत संगीतकार के अनुरोध पर वैसा ही रिलीज़ हुआ। अपने तुलना रफ़ी साहब से किए जाने के दबाव पर उन्होंने विनम्रता से कहा कि दुनिया में सिर्फ एक ही रफ़ी साहब हो सकते हैं। 

    कार्यक्रम के प्रथम चरण में स्टेट प्रेस क्लब, मप्र के अध्यक्ष श्री प्रवीण कुमार खारीवाल, बंसी लालवानी, सुदेश गुप्ता, दीपक पाठक, कुमार लाहोटी, संजय मेहता, पूर्व आरटीओ श्री आर आर त्रिपाठी, पुष्कर सोनी एवं राजेंद्र कोपरगांवकर ने श्री शाहिद रफ़ी, श्री आर के शर्मा एवं श्री मनीष शुक्ला का स्वागत किया। कार्यक्रम में प्रश्नों के साथ सूत्र संचालन श्री आलोक बाजपेयी ने किया। अंत में आभार प्रदर्शन श्री प्रवीण कुमार खारीवाल ने किया।

    श्री शाहिद रफ़ी उवाच

    * किशोर कुमार और रफ़ी साहब की कोई प्रतिद्वंदिता नहीं थी। ये उड़ाई हुईं बातें हैं। दोनों एक दूसरे को बहुत पसंद करते थे, एक दूसरे के साथ आनंद करते और उनके लायक गाने के लिए एक दूसरे की सिफ़ारिश करते थे। 
    * रफ़ी साहब हर संगीतकार को उस्ताद मानकर सम्मान देते थे क्योंकि उसने उन्हें वह गीत सिखाया। 
    * दादाजी कभी नहीं चाहते थे कि रफ़ी साहब संगीत में जाएं। लेकिन अंततः संगीत की जीत हुई। 
    * रफ़ी साहब की कार का रंग हमेशा एकदम अलग होता था और इसलिए उनकी कार दूर से पहचानी जाती थी। ट्रैफिक सिग्नल पर उन्हें मांगने वाले घेरते तो वे बिना देखे या गिने दान देते थे। उनका कहना था कि ऊपरवाले जब उन्हें बिना गिने दिया है तो वे क्यों गिनकर दें।
    * लताजी से छोटी सी अनबन को कभी उन्होंने दिल में नहीं रखा। उनके बीच प्रेमपूर्ण रिश्ता था।
    * एक गाने में उनके गले से खून निकलने की बात भी मनगढ़ंत थीं।

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